धीरेधीरे लोप होइत जरजटिन
भाषा/संस्कृति


धीरेधीरे लोप होइत जरजटिन

भाषा/संस्कृति 3 पटक पढिएको बज्जिका संवादाता २०७४ श्रावन ०२ सोमबार




मनोज कुमार चौधरी भादो इँजोरियामे बेटीबहिनके द्वारा खेले जाएबाला गीति लोक नाटक जरजटिन अब धीरेधीरे लोप होएल जारहल हए । भादो महिनाके इँजोरियामे अविवाहित चाहे विवाहित बेटीबहिनके साथे महिलाद्वारा गीत गबइत दू समूहमे जाटा आ जटिनके पक्षके होखे खेले जाएबाला जरजटिन मधेसके संस्कृतिके एगो महत्त्वपूर्ण अंग रहल मानलजाइअ ।

मधेस संस्कृतिके एगो विशिष्ट पहचानके रुपमे रहते आएल जरजटिनके प्रतिके आकर्षण ग्रामीण समाजमे भी अब पहिलेके लेखा नरहल आ धीरेधीरे कम होइत गेल बुद्धिजीवी लोगके कहनाम हए । शिक्षक किशुन दयाल यादवके मोताबिक नयाँ पुस्तामे जरजटिनके आकर्षण बिलकुले नरहल समाजमे देखलगेल हए । सहरी क्षेत्रमे त जरजटिनके चर्चा होनाइ भी लगभग बन्द होगेल कुछ लोगके कहनाम हए । आधुनिक समाजमे विद्युतीय मनोरंजनके साधनके विकास आ आदमीके व्यस्तताके चलते साथे अपना संस्कृतिके बचाके राखेके चेतनाके अभावमे जरजटिन लोप होते जारहल शिक्षक यादवके दाबी रहल हए ।


लोप होइत जारहल जरजटिन जदि कौनो गाँओमे होइतो हए त बहुत कम गाँओमे आ कमे दिनके लेल होअले । पहिलेके जइसन उत्साह आ सहभागिता जरजटिनपर अब नरहल जइसन सभीओर महसुस कएलजारहल हए । जहाँ ई गीति लोकनाटक होइअ उँहा भी सग्यानके सहभागिताके बिना कमे उमरके बेटीबहिनलोगके सहभागिता बेसी देखल जाइअ । विभिन्न सामाजिक आ पारम्परिक तथा आधुनिक आवश्यकताके अपना गीतमे जोडके खेले जाएबाला ई गीति नाटकके बज्जिका संस्कृतिके एगो अंगके रुपमे साहित्यकार शीतल गिरी उल्लेख कएले छत । जरजटिन त मधेसके संस्कृतिके एगो सम्पत्ति होएलासे एकर संरक्षण करेके बहुत जरुरी रहल दोसर शिक्षक देवेन्द्र साहके कहनाम हए । मधेसके संस्कृतिके लेके खास कौनो प्रतियोगिता नहोएलासे मधेसके संस्कृतिके राष्ट्रियकरण नहोएसकल हए । ए कारणसे अइसन संस्कृतिके संरक्षण करेके लेल केनहुसे खास कौनो कदम नउठारहल हुनकर कहनाम हए ।


गीति नाटकके पूर्ण कऽके खेललापर करिब चार घन्टा चलेबाला आ एक पखमे दूबेर खेलेके होएलासे ए नाटकमे कुछ झन्झट भी रहल महिलालोगके अनुभव हए । महिला ही पुरुष आ महिला दुनुके रुप धारण कऽके सभी बात गीतके माध्यमसे ही रखेबाला होएलासे ई संस्कृतिके अत्यन्त मूल्यवान सम्पत्ति रहल लोगके कहनाम हए । एक दोसराके आगे निहुरके गीत गबइत महिला सब बहुत खुस नजर आबइअ । ए गीति लोक नाटकके सभी लोकगीतसे अलग स्वर रहल हए । बज्जिका भाषाके मौलिक गीत बहुत रहल आ अपना माटीके सुगन्धसमेत मिलेबाला जरजटिनके संरक्षण आ सम्वर्धन करनाई बहुत जरुरी रहल बज्जिका भाषा शिक्षक प्रतिष्ठानके अध्यक्ष सफिन्द्र प्रसाद यादवके कहनाम हए । होसके त सरकारके मुह ताकेके न त अपन संस्कृतिके बचाबेके लेल सभी बुद्धिजीवी तथा सर्वसाधारणके समयपर ही ध्यान देनाइ बहुत जरुरी होगेल हए । अब भी जरजटिनके संरक्षणके ओर सकारात्मक कदम तत्काल नचालल जाइत हए त जरजटिन बिहानके दिनमे समाजके सम्पत्तिके रुपमे नहियो रहेके खतरा बढल यादवके चिन्ता रहल हए ।





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