भाषा/संस्कृति




  • जरजटिन ः एगो महत्वपूर्ण संस्कृति



    श्याम सहनी “चन्द्रांशु”

    हर मौसममे अनेक संस्कृति हए समाजमे । हर मौसमके अपन अलग विशेषता भी होअले । ओइसही मौसमोमे वर्षा आउर वर्षामे भादा महिना बडा सुहावन महिना हए । आकाशमे उमरल घटाके मधुर मधुर गर्जन चमक चमकके तरकाके साथे रिमझिम गिरेबाला आकाशके बुनी वास्तवमे बहुत सुन्दर हए । आकाशसे धरतीतकके छिनछिनमे बदलइत रहेबाला प्राकृतिक सौन्दर्य थप सुन्दरता प्रदान करइअ । दिनमे दुपहरियाके गर्मी सामके बहल शीतल बयार आ भोरवेके सिसकल पछमी पवनसे मनके गज्जब भावुकता अनुभूति प्रदान करइअ ।

    देव भाषा संस्कृत, भारतीय भाषा हिन्दीसहित हर लोकभाषाके ज्ञात–अज्ञात कविके वाणीके साथे लोकसाहित्यमे भी ई सुहावन मौसम भादोके हर त्यौहारके अवसरपर लोकसाहित्यमे उपदेशात्मक रुपसे कही मानवीकरणके स्वरुपमे ई महिनाके देखलगेल हए । एहीसे भादो महिनाके एगो विशेष महत्व आ स्थान देके लोकजीवनमे अनेक किसिमके गीतके अभिव्यक्ति भेल प्राप्त होइअ । भादो महिनाके विषयमे भी लोकसाहित्यमे अनेक किसिमके अभिव्यक्ति मिलइअ मगर भादो महिनाके जरजटिन आ चाँचर गीतके भी विशेष महत्व रहल हए ।

    वर्षाके वर्णन करेके क्रममे शृङ्गारके दुगो पक्षमे वर्णन कएलगेल मिलइअ – संयोग आ वियोग । समग्रमे देखलापर वियोग पक्षमे कुछ अधिक देखेला मिलइअ आ तुलनात्मकरुपसे संयोग पक्षमे कुछ कम । संयोग सुखके अपेक्षा विरहजन्य पीडा संवेदनशील आउर हृदयस्पर्शी बेसी मिलइअ । लोकसाहित्यके विषयमे दर्पणकार आचार्य विश्वनाथजीके कहल हए – बनिा वियोगके शृङ्गार रसके पुष्टि नहोइअ । माली क्षेत्रके एक वियोगिनी कहइअ “ हे साहबजी !भादोके मौसम रिमझिम परल पानी, आकाशमे देखाइ देबेबाला उज्जर, करिया बादल आ गरमी ठन्ढी दुनुके सुखद संयोगवाला मौसमसे जटिन अपन जटबासे गीतके माध्यमसे कहइअ –

    जब जब टिकबा मङलिअऊ रे जटबा

    टिकबा काहे नलेअओले रे

    हमर बाली उमरिया रे जटबा,

    टिकबा कहाँ गमओले रे

    टिकबा काहे नलेअओले रे............।

    जटबा जबाबमे कहइअ –

    जब जब टिकबा लेअइलिअऊ गे जटिन

    टिकबा काहे नपेन्हले गे

    तोहर बाली उमरिया गे जटिन

    नहिरा काहे गमओले गे.........।

    जटिन फेर कहइअ –

    जब जब हँसुली मङ्लिअऊ रे जटबा

    हँसुली न काहे लेअओले रे

    मोरी बाली उमरिया रे जटबा

    हँसुली कहाँ गमओले रे.......।

    जटबा जबाबमे बोलइअ –

    जब जब हँसुली लेअइलिअऊ जटिनिया

    हँसुली न काहे पेन्हले गे

    तोरी बाली उमरिया जटिनिया

    नहिरा काहे गमओले गे........।

    अइसन अनेक शृङ्गार तथा घरायसी प्रयोग आ प्रयोजनके सामानके माग आ ओकरा पूरा करेके लेल प्रतिबद्धता दुनुओरसे सबाल–जबाबके लेखा चलइत रहले । रातभर चलेबाला जरजटिन लोकनाटकके अनेक पहलु रहल हए ।

    बज्जिका साहित्यके विषयमे कविलोग अपना लोकसाहित्यके खोजतलास करेके क्रम चलरहल ही हए । नेपाल आ भारत लगायतके देशके विभिन्न साहित्यकार तथा अनुसन्धानकर्मी लोग बज्जिका लोकसाहित्यके साथे जरजटिनपर खोजअनुसन्धान कररहल हए । बहुत अनुसन्धान होएल भी हए । लोकसाहित्यके एगो महत्वपूर्ण अंगके रुपमे रहल गीति लोकनाटक जरजटिन प्रेम, स्नेह, अपनापन, सामाजिकता, दुखसुख, समाजके वास्तविकतालगायतके विषयवस्तु आदिके देखलजाइअ । जरजटिनमे शृङ्गारके सम्भोग शृङ्गार आ विप्रलम्भ शृङ्गार दुनुके रुप भी रहल देखलगेल हए ।

    हमनीके गाँओमे भादो महिनाभर बेटीबहिन आ महिला लोग जरजटिन आ मर्द लोग भैंसी चराबेके समय, घास काटेके खेतमे सोहनी करेके समयमे एकल वा सामूहिक रुपसे चाँचर गीत गबइअ । चाँचरके परम्परा बहुत पुरान हई । मूलरुपसे भादोसे सुरु होएबाला चाँचर गीत अगहन–पुसतक चलले लेकिन आजकाल चाँचरके चलन भी धीरेधीरे कम होरहल देखलगेल हए । चाँचर गीतमे भी बिरहा वियोगके भाव छुपल हए । गीतमे एगो विरहिनीके वियोगमे बिरहाके गीत एना गबइअ –

    कौने महिनबामे चाँचरके जलमिया

    कौने महिनबामे बिआह ऽऽऽ ऽऽऽ ।

    भादोके महिनबामे चाँचरके जलमिया

    आसिन महिनबामे बिआह हो ऽऽऽ ।

    कवने महिनवामे चाँचरके गवनवा

    कातिक महिनवामे चाँचरके गवनवा ।

    चाँचर गीतमे मनोरंजनके साथे शिक्षा भी प्राप्त होइअ । साथमे आख्यानतत्व भी हए । बहुत लम्बा समयतक गासकेके क्षमता रहल हए । पहिलेके लोग बैलगडी चलाबे आ लम्बा सफरमे गडिबान सब चाँचर गीत गबइत रस्ता काटे । गडीमे कौनो सामान लेआबे–लेजाएके काम होखो चाहे आदमीके लेके केनहु जाएके होखे । अपना दुखसुखसे समय उबरलापर लोग चाँचर गीतसे समय बिताबेके सुन्दर उपाय खोजे । आजके व्यस्त जिन्दगीमे मनोरंजनके अनेक साधनके विकास होएलासे सोहनी, घसबाही आ गाईभैंसी चराबेबाला लोगके बीच मात्रे सीमित होके रहगेल हए चाँचर गीत ।

    बज्जिका संस्कृतिमे भी बहुत पुरान हए । संस्कृतिमे होएबाला सभी गुणसे सम्पन्न हमनीके संस्कृति बहुत धनिक रहल हए । जरजटिन, झिझिया, समाचकवा, चामचमकुनलगायतके पबनी अपनेआपमे ही निराला हए । सभीके अपन अलग अलग विशेषता आ महत्व भी हए । जरजटिन आ डोमकच महिला लोगके गीत आ नृत्यके साथे रातभर चलेबाला गीतिलयके लोकनाटक हए ओहीलेखा मर्दलोग निर्गुन, सोहर, भजन, कीर्तन, चाँचर, पहराति, लचारी, विरहा, पूर्वी, कजरी, लोरकाइनलगायतके बहुत सांस्कृतिक उत्सवके हिसा हए । बिआह, पूजा, संस्कार गीत बज्जिका लोकजीवनके बहुत लमहर अंग रहल हई । बज्जिका लोकजीवनमे ऐतिहासिक गीत आ नाच, अलहा, गोपीचन, राज ढोलन, भरथरि, राजा नल, दुलरा देयाल, हरिश्चन्द्र, रानी सारंगा, सोरठी वृजाभारसहितके गीत भी प्रचलनमे रहल हए । विभिन्न लोकदेवदेवीके गीत आ भजन त बज्जिका लोकजीवनके अपन मौलिक संस्कृति ही रहल हए । हर महिनाके अपन अनेक विशेष गीत भी रहल हए । बज्जिका लोकजीवनके लोकसाहित्य त बहुत विलुप्त होगेल भी मालुम होइअ लेकिन जेही हए तेहिमे बज्जिका संस्कृति एकदम अपनेआपमे भरिपूर्ण हए । वास्तवमे लोकजीवनमे रहल अनेक गीतके बज्जिका भाषाके शृङ्गार कहल जासकइअ । अपने लोग एतनासे ही बज्जिका लोकसाहित्य आ लोकसंस्कृतिके सम्पन्नताके अनुमान लगासकइछी ।






  • श्रद्धापूर्वक मनाबल जारहल हए जितिया पबनी - 2016-09-23

    सम्पूर्ण मधेसी समुदायके महिला जितिया पबनी श्रद्धापूर्वक मानरहल हए । काल्हु नहाके खएले महिला सब सन्तानके सुख तथा लम्बा आयुके कामनासहित कठित पबनी कररहल हए । घिउँराके पत्तापर तेल आ खरी चढाके काल्हु लोकदेवता जितबाहनके आह्वान कएले सन्तानवती व्रतालु महिला एहबेर भोरमे दहीचिउरा चढएले हए ।


    बज्जिका कलाके संरक्षण आ विकासके लेल गौरमे सम्पन्न भेल हए वृहत छलफल - 2016-06-05

    बज्जिका कलाके संरक्षण, संवद्र्धन आ विकास होनाइ जरुरी रहल महसुस कएलगेल हए । बज्जिका साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी, प्रचारक तथा शुभचिन्तक लोग एगो कार्यक्रमके बीच बज्जिकाभाषी क्षेत्रमे रहल हिन्दु तथा मुस्लिमके संस्कृति, साँस्कृतिक सम्पदा आ जनचेतनाके भी कलाचित्रकलाके


    बज्जिकांचलमे परम्परागत किसिमसे मनाबलगेल हए सतुवान पबनी - 2016-04-14

    बज्जिकांचल समाजमे नयाँ वर्ष सतुवान कके मनाबेके परम्परा रहल हए । ग्रामीण समाजके साथे सहरिया जीवनमे भी बुजुर्ग लोग नयाँ वर्षके सुरुआत सतुवाके साथे कएले छत । बैसाख १ गते सतुवानके रुपमे मनाबेके परम्परा बज्जिकांचल समाजमे चलते आरहल हए ।


    बज्जिाका भाषीसव विश्व मातृ भाषा दिवस विभिन्न कार्यक्रम कके मनएलक - 2016-02-21

    विभिन्न कार्यक्रम करके बज्जिका भाषामे विश्व मातृ भाषा दिवस मनावल गेल हए । ग्रामिण शिक्षा विकास नेपालके आयोजनामे आजु रौतहट जिल्लाके सदरमुकाम गौरमे विभीन्न कार्यक्रमसव करके बज्जिका भाषा विकास समारोह २०७२ भव्यताके


    विश्व मातृभाषा दिवसमे बज्जिका भाषामे विद्यालयस्तरीय वक्तृत्वकला भेल हए सम्पन्न - 2016-02-19

    एगो कार्यक्रम करके मातृ भाषा दिवस मनावल गेल हए । विश्व मातृभाषा दिवसके अवसरपर जिलाके सदरमुकाम गौरमे विद्यालयस्तरीय वक्तृत्वकला प्रतियोगिता सम्पन्न भेल हए । ग्रामीण शिक्षा विकास नेपाल रौतहटके आयोजना तथा जिला विकास समिति


    बज्जिका साहित्यकारके बज्जिकांचलसे निरन्तर होरहल हए पलायन - 2016-01-07

    बज्जिका भाषा आ साहित्यके क्षेत्रमे सक्रिय लोगके बज्जिकांचल क्षेत्रसे निरन्तर पलायन होरहल हए । बज्जिका शुभचिन्तक, साहित्यकार तथा भाषासेवी एवं भाषाप्रेमीके दोसरा जिला पलायनके बेमारीसे बज्जिका भाषा आ साहित्य पीडित बनते गेल हए । समनपुष्प साहित्यिक त्रैमासिकके सम्पादन कके बज्जिका भाषाके साहित्य आ लोकसाहित्यके विशेष योगदान देले रमेशमोहन अधिकारी रौतहटसे मकवानपुर पलायन होएल रहलन । साथे सूर्योदय साहित्यिक पत्रिकाके सम्पादकके रुपमे भी अधिकारी बज्जिकाके प्रोत्साहनके लेल भरमग्दुर प्रयास कएले रहलन । साहित्यकार शीतल गिरी भी आधा दशक पहिले रौतहटसे काठमान्डुमे चलगेल छत । रौतहटरश्मि साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिकामे बज्जिकाके विशेष महत्व आ स्थान देबेबाला


    बज्जिका साहित्य गोष्ठी गरुडामे भेल हए सम्पन्न - 2015-12-26

    बज्जिका साहित्य संगम रौतहटद्वारा गरुडामे साहित्य गोष्ठी सम्पन्न भेल हए । गरुडा नगरपालिका वार्ड नम्बर २ मित्रनगरमे बज्जिका भाषा विकास परिषदके केन्द्रीय उपाध्यक्ष लालबाबु साहके प्रमुख आतिथ्यमे शुक्रबार सम्पन्न कार्यक्रममे करिब


    बज्जिका भाषा आ साहित्यके उन्नायक समर्थन कएले छत गृह जिला प्रस्थान - 2015-12-17

    बज्जिका भाषा आ साहित्यके क्षेत्रमे अमूल्य योगदान देबेबाला शिक्षक रमेशहरि शर्मा ढकाल अपना जिला लौटल छत । तीस वर्ष तीन महिना रौतहटके विभिन्न सरकारी विद्यालयमे शिक्षण सेवासे जुटल ढकाल रमेश समर्थन नाओसे साहित्य सिर्जना


    मुनामदन बज्जिकामे, भाषा विकासके लेल दर्जनों लोगद्वारा जनाबलगेल प्रतिबद्धता - 2015-11-15

    नेपाल बज्जिका भाषा शिक्षक प्रतिष्ठान आ बज्जिका साहित्य संगम रौतहटके आयोजनामे बज्जिका भाषाके विकासके लेल आयोजित एगो विशेष कार्यक्रममे सहभागीलोग बज्जिका भाषाके विकासके लेल अपनातरफसे प्रतिबद्धता व्यक्त कएले छत ।


    बज्जिका भाषा विकास हेतु साहित्य गोष्ठी तथा शभकामना कार्यक्रम - 2015-10-19

    बज्जिका साहित्य गोष्ठी तथा शभकामना आदानप्रदान कार्यक्रम सम्पन्न भेल हए । रौतहटके गरुडा नगरपालिका अन्तर्गत मलाहीमे साहित्यकार सञ्जय मित्रके अध्यक्षतामे बज्जिका साहित्य गोष्ठी तथा शुभकामना आदानप्रदान कार्यक्रम सम्पन्न भेल हए ।


    बज्जिका साहित्य संगम रौतहट भेल गठन - 2015-10-19

    बज्जिका भाषाके साहित्यके विकास तथा विस्तारके लेल रौतहटमे एगो संस्थाके गठन कएलगेल हए । बज्जिका साहित्यकार संजय मित्रके अध्यक्षतामे गरुडा नगरपालिकास्थित मलाहीमे बज्जिका भाषाके साहित्यकारलोगके भेलासे बज्जिका साहित्य संगम रौतहटके गठन कएलगेल हए ।


    सन्तानके लेल :- जितिया पबनी - 2015-10-05

    नेपालके सांस्कृतिक क्षेत्रमे भी धनिक मानेजाएके अपने कारण हई । सांस्कृतिक विविधता एक्कर लमहर सम्पत्ति हई । हर जात समुदाय आ सम्प्रदायके अपन अनेक किसिमके पबनी तेहार रहल हए । मधेसके साझा संस्कृतिमे भी अइसन बहुत पबनीतेहार हए जे वास्तवमे ओतना प्रसारप्रसार नहोएलापर भी बहुत महत्त्वपूर्ण मानलजाइअ ।


    धीरेधीरे लोप होइत जरजटिन - 2015-09-29

    भादो इँजोरियामे बेटीबहिनके द्वारा खेले जाएबाला गीति लोक नाटक जरजटिन अब धीरेधीरे लोप होएल जारहल हए । भादो महिनाके इँजोरियामे अविवाहित चाहे विवाहित बेटीबहिनके साथे महिलाद्वारा गीत गबइत दू समूहमे जाटा आ जटिनके पक्षके होखे खेले जाएबाला जरजटिन मधेसके संस्कृतिके एगो महत्त्वपूर्ण अंग रहल मानलजाइअ ।


    जरजटिन ः एगो महत्वपूर्ण संस्कृति - 2015-09-29




    बज्जिकावाणी बेवसाइटके संचालनमे अएलापर बज्जिकासेवीद्वारा शुभकामना व्यक्त - 2015-09-27

    बज्जिका भाषाके पहिल बेबसाइट संचालनमे अएलापर बज्जिकासेवी आ बज्जिका भाषाके शुभचिन्तकलोगद्वारा शुभकामना व्यक्त कएलगेल हए । बज्जिका भाषामे रामायणके लेखक एवं बज्जिकाके भीष्म पितामह डा. अवधेश्वर अरुण खुसी व्यक्त करइत बज्जिका भाषा संचारके नयां युगमे प्रवेश कएले बतएले छत ।


    बज्जिका गीता भेल प्रकाशित - 2015-09-27

    नेपालीय बज्जिका भाषाके एगो महत्वाकांक्षी ग्रन्थ बज्जिका गीता प्रकाशित भेल हए । रौतहट चन्द्रपुरके हरिकृष्ण काफ्लेद्वारा रचित बज्जिका गीता चौरासी पृष्ठके रहल हए । करिब चार बरिस पहिले रचना भेल कृतिके ग्रामीण शिक्षा विकास नेपाल जेठरहिया प्रकाशन कएले हए ।


    बज्जिकामे पिएचडि करेबालाके संख्या बढल - 2015-09-27

    भारत आ नेपालके विभिन्न जिलामे लोकभाषाके रुपमे हजारो बरिससे अस्तित्वमे रहल बज्जिका भाषामे पिएचडि करेबालाके संख्या दिनपर दिन बढते जारहल हए । सन् १९७०के आसपासमे बिहारके गोपालगंज जिलाके गोपेश्वर कलेज हथुआके प्रोफेसर डा. श्रीरंग शाही बज्जिका भाषापर पहिलबेर पिएचडि


    बज्जिकामे पिएचडि करेबालाके संख्या बढल - 2015-09-27

    भारत आ नेपालके विभिन्न जिलामे लोकभाषाके रुपमे हजारो बरिससे अस्तित्वमे रहल बज्जिका भाषामे पिएचडि करेबालाके संख्या दिनपर दिन बढते जारहल हए । सन् १९७०के आसपासमे बिहारके गोपालगंज जिलाके गोपेश्वर कलेज हथुआके प्रोफेसर डा. श्रीरंग शाही बज्जिका भाषापर पहिलबेर पिएचडि


    त्याग और समर्पणके त्योहार ईद—उल—अजहा मानवल जारहल - 2015-09-25

    ईद—उल—अजहा या ईदे—अजहा मुस्लिम भाइयोके एगो महत्वपूर्ण त्योहार हए । ईद तीन तरहके होईअ । ईद—अजहाके अलावा दुगो और ईद हए— ईदुलफित्र या रमजान ईद और दोसर ईदके मिलादुन्नबी कहइअ । पर ईदुल फित्र होए, ईद अजहा या ईद मिलाद, तीनु ईद भाइचारा, त्याग, समर्पण और इंसानियतके पैगाम देईआ ।


    समाप्त होएके अवस्थामे, धार्मिक एवम् पर्यटकीय पहिचान - 2015-08-14

    जिल्लाके सदरमुकाम गौर स्थित बरहवा ताल क्षेत्र, सिवनगर शिव मन्दीर, राजदेवमे रहल राजदेवीमन्दीर, महादेपटी शिव मन्दीर, बागमति नदी किनारमे रहल

बज्जिका वाणी

2072-08-08
2070-01-22 .pdf

बिकाश चौतारी

BC 2073-05-06
BC 2073-05-06
BC 2073-04-31
2072-08-28

जिल्ला प्रहरी का. - ५२००९९
जिल्ला प्रहरी का. - ५२०१७७
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